समझदारों की दुनिया में विद्वानों की कमी खल्ती है. 

मालूम नहीं था कि समाज में मांसाहारी इंसान

 

नहीं, आत्मा और कर्म हुआ करते हैं. 

अमीरों की तादाद ऐसे बढ़ रही है कि न जाने कितने

 

गरीब अमीर बनते जा रहे हैं. फिर भी किसी अमीर

 

को गरीब की मदद करते नहीं सुना, देखा. 

भ्रष्टाचार सामाजिक धरोहर है. 

जब भी हमारा दया-भावना दिखाने का मन होता है हम लोग खुद को खुश करने में जुट जाते हैं और खुद को श्रेय देते हैं समाज के भले के बारे में सोचने के लिए. 

 हास्य रस में व्यंग्य ढूँढ़ने निकलोगे तो लोगों को तुम्हारी तफ़्तीश करते मिलोगे.

एक सज्जन ने पुछा: सोच किस ख़्याल में डूबी हुई है?  
आईने में देखकर, जवाब देते हुए बोले:

खुद की तबीयत ठीक है
पूरा देश इसी दुआ में लगा हुआ है,
खुद की तबीयत ठीक है 
पूरा देश दुआ में दुसरे के हक़ को छीनने में लगा हुआ है. 

एक हारे हुए खिलाडी के पास पत्रकार पहुँचा।
खिलाडी ने उसके हाथ में सफ़ेद काजग पर नीचे हस्ताक्षर कर उस में कुछ भी लिख कर छाप देने को कहा.
हाथ में कागज थमाते हुए बोला: तुम्हें कम से कम इतना एहसास तो हो जायेगा कि झूठ बोलने में कितने काबिल हो.  

हर आम और ख़ास इंसान एक जैसी ही भावनाएं रखता है